यह शब्द, देश के लिए मोहब्बत और गर्व के बजाए, सरकार की नीतियों में अंधा भरोसा न दिखाने वालों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होने वाला हथियार बन गया है। विडंबना है कि चीन के साथ गंभीर दुश्मनी के इस वक़्त में प्रधान मंत्री और भाजपा ने राष्ट्रवाद का चीनी वर्जन अपनाया है। यह ऐसा वर्जन है जी सभी तानाशाही देशों में मौजूद था।
एक चीज़ जो हमें चीन की तुलना में कहीं बेहतर बनाती है वह हमारा प्रजातंत्र है, इसलिए जिन लोगों ने राष्ट्रवाद की यह नई परिभाषा गढ़ी है, वे भारत के सबसे बड़े दुश्मन हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें हम टीवी चैनलों के प्राइम टाइम डिबेट में उन लोगों को गाली देते हुए देखते हैं जो प्रधान मंत्री की किसी नीति पर सवाल उठाने की हिम्मत करते हैं। अफ़सोस है इन दिनों इस तरह का बर्ताव टीवी ऐंकर करते हैं। लगता है वे यह भूल गए हैं कि पत्रकारिता का सबसे अहम उसूल सरकार को आइना दिखाना है, उससे सच बोलना है।
यह साल मोदी के लिए सबसे ज़्यादा चुनौतियों वाला साल है। उन्हें अपने लंबे सियासी करियर में सच बोलने वालों की कभी इतनी ज़रूरत नहीं पड़ी जितनी इस वक़्त है। अगर किसी ने शाहीन बाग़ के धरना प्रदर्शन के वक़्त उनसे सच बोलने की हिम्मत दिखाई होती, तो उन्हें समझ में आ जाता कि जो औरतें दिल्ली में जाड़े की कड़कड़ाती ठंडी रात में प्रदर्शन के लिए तय्यार थीं, उन्होंने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उन्हें अपने भारतीय होने के अधिकार के छिनने का डर था।
जब यह बात साफ़ हो गयी कि कोरोना वायरस दिल्ली से बाहर तेज़ी से फैल रहा है तो प्रधान मंत्री ने दुनिया के कठोर लॉकडाउन से उसका जवाब दिया। लॉकडाउन से सिर्फ़ कोविड-19 के फैलने की रफ़्तार कम हुयी लेकिन प्रधान मंत्री के क़रीबी लोग उनसे कह रहे हैं कि अगर उन्होंने यह क़दम न उठाया होता तो शहरों की सड़कों पर लाशों के ढेर होते। अगर मीडिया ने अपना काम सही तरह अंजाम दिया होता तो उसने कहा होता कि यह वायरस अभी बाक़ी रहेगा और अगर हमने ख़तरनाक होती आर्थिक स्थिति को न संभाला तो लोग भूख से मरेंगे बीमारी से नहीं।
शुक्रवार को प्रधान मंत्री का लद्दाख़ का दौरा देख कर अच्छा लगा लेकिन उन्हें किसी भी समय की तुलना में इस वक़्त अपने आस-पास सच्चे राष्ट्रवादियों की ज़रूरत है। ऐसे लोग जो उन्हें यह बताने की हिम्मत करें कि इस चुनौती भरे साल में वह किस तरह भारत का नेतृत्व कर सकते हैं। सच्चा वतनपरस्त और राष्ट्रवादी वह है जो सत्ता से सही अर्थ में सच बोले। मोदी को ऐसे लोगों की इस वक़्त सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। ( इंडियन एक्सप्रेस में तवलीन सिंह के लेख का सारांश)